Description
सिंहवर्धन के सीने में जल रही आग उसके शरीर के घावों से कहीं अधिक भयानक है। उसकी आँखों के सामने दरिंदों ने उसकी माँ, उसके पिता और उसके कबीलेवासियों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। और अब उसके अपने शरीर को भी छलनी कर दिया गया है, पीछे छोड़ते हुए सिर्फ पीड़ा, क्रोध और बदले की आग।
अब इस प्रतिशोध की ज्वाला से एक ही सवाल उठता है—क्या यही आग फिर जन्म देगी एक घातक नरसिंह को?
